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डी.के. बसु मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी के बाध्यकारी दिशानिर्देश दिए

18 दिसंबर 1997 को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में यातना और मौतें रोकने के लिए गिरफ्तारी के बाध्यकारी नियम तय किए।

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यह सार AI ने संदर्भ पूरा करने के लिए लिखा है; यह किसी ताज़ा स्रोत पर आधारित नहीं है।

18 दिसंबर 1997 को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में फैसला सुनाया। मामला तब शुरू हुआ जब पश्चिम बंगाल लीगल एड सर्विसेज के कार्यकारी अध्यक्ष डी.के. बसु ने मुख्य न्यायाधीश को पुलिस हिरासत में हुई मौतों के बारे में पत्र लिखा। अदालत ने इस पत्र को जनहित याचिका, यानी व्यापक सार्वजनिक हित में दायर मामला, माना।

न्यायाधीशों ने कहा कि हिरासत में यातना और मौत संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। इसके बाद अदालत ने ऐसी शर्तों की सूची तय की, जिनका पालन पुलिस और अन्य एजेंसियों को किसी को गिरफ्तार या हिरासत में लेते समय करना होगा। इनमें गिरफ्तार करने वाले अधिकारियों की स्पष्ट पहचान, परिवार के सदस्य या स्थानीय व्यक्ति की गवाही वाला गिरफ्तारी मेमो, किसी रिश्तेदार या मित्र को सूचना और हिरासत में लिए गए व्यक्ति की नियमित अंतराल पर चिकित्सा जांच शामिल थीं।

अदालत ने कहा कि नियमों का पालन न करने पर विभागीय कार्रवाई और अदालत की अवमानना की कार्यवाही हो सकती है। इन दिशानिर्देशों की झलक बाद में दंड प्रक्रिया संहिता में हुए बदलावों में दिखी, और ये आज भी पुलिस शक्तियों तथा हिरासत में लोगों के अधिकारों पर बहस का मुख्य संदर्भ हैं।

कहानी की टाइमलाइन

24 घंटे की हिरासत सीमा पर सुप्रीम कोर्ट · 3 घटनाएँ

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  1. डी.के. बसु मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी के बाध्यकारी दिशानिर्देश दिए

इस ख़बर से पहले और बाद में क्या हुआ। पहले न बताई गई पृष्ठभूमि की घटनाएँ AI ने संक्षेप में लिखी हैं।

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